लखीसराय ROB की खुली पोल, 6 साल में जर्जर हुआ ओवरब्रिज, IIT की रिपोर्ट के बाद निर्माण एजेंसी 15 साल के लिए ब्लैकलिस्ट

निर्माण की गुणवत्ता में गंभीर खामियां, आईआईटी की तकनीकी जांच में संरचनात्मक क्षति का खुलासा और उसके बाद निर्माण एजेंसी पर 15 साल का कड़ा प्रतिबंध—लखीसराय बाइपास स्थित रेल ओवर ब्रिज (ROB) की पड़ताल में सामने आए तथ्य निर्माण की गुणवत्ता और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

सूचना का अधिकार (RTI) के तहत पथ निर्माण विभाग से प्राप्त दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), पटना की उच्चस्तरीय जांच में पुल के अधिकांश गर्डर में एक-दूसरे के काफी नजदीक कई दरारें पाई गई हैं। इसके अलावा पाट/पीटीएफई (PTFE) बेयरिंग और सुदृढ़ीकरण के लिए इस्तेमाल किए गए सरिया में भी जंग लगने की बात उजागर हुई है।

आईआईटी पटना ने अपनी जांच रिपोर्ट में इन खामियों को पुल की संरचनात्मक सुरक्षा (Structural Safety) के लिहाज से अत्यंत चिंताजनक माना है। रिपोर्ट में विस्तृत तकनीकी जांच और आवश्यक मरम्मत अथवा पुनर्निर्माण पूरा होने तक पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही तत्काल सीमित करने की सिफारिश की गई थी।

विभागीय कार्रवाई का घटनाक्रम

विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक, मुख्य अभियंता (दक्षिण) ने 18 मई 2026 को निर्माण एजेंसी को काली सूची में डालने की अनुशंसा की थी। इसके बाद विभाग ने 1 जून को संवेदक को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

एजेंसी द्वारा 8 जून को प्रस्तुत स्पष्टीकरण असंतोषजनक पाए जाने पर पथ निर्माण विभाग ने 13 जून 2026 को बाबा हंस कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को 15 वर्षों के लिए काली सूची (Blacklist) में डालने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया।

चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस आरओबी का निर्माण कार्य 31 मार्च 2020 को ही पूरा हुआ था। निर्माण पूरा होने के महज छह साल के भीतर इतनी गंभीर खामियां सामने आना निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और सुपरविजन करने वाले अभियंताओं की भूमिका पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

आरटीआई से सच आया सामने, पर मरम्मत की समय सीमा अस्पष्ट

स्थानीय निवासी राज किशोर मधुकर द्वारा आरटीआई के तहत मांगी गई जांच रिपोर्ट और विभागीय अभिलेखों से निर्माण एजेंसी पर हुई कार्रवाई का पता तो चल गया है, लेकिन पुल की वर्तमान सुरक्षा स्थिति, आवश्यक सुधारात्मक उपाय और यातायात प्रबंधन को लेकर विभाग का रुख अब भी अस्पष्ट है।

निर्माण एजेंसी को दंडित करना जवाबदेही तय करने की दिशा में एक कदम जरूर है, परंतु पुल को अविलंब सुरक्षित बनाना और शहरवासियों को दैनिक आधार पर हो रही परेशानियों से निजात दिलाना भी उतना ही अनिवार्य है।

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