ज्ञानवापी प्रकरण में अपने फैसले को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार वजह मुजफ्फरनगर में हत्या के मामलों में उनके हालिया फैसले हैं. बीते 6 अप्रैल से 6 जुलाई 2026 के बीच उन्होंने अलग-अलग छह हत्याकांडों में कुल 13 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है. कम समय में आए इन फैसलों को लेकर न्यायिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है.
तीन महीने में किन-किन मामलों में सुनाई गई फांसी?
6 अप्रैल 2026: अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड
20 जून 2026: राजेंद्र सैनी हत्याकांड
अदालत ने रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को फांसी की सजा सुनाई.
2 जुलाई 2026: होमगार्ड रतिराम हत्याकांड
होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में आरोपी दीपक को मृत्युदंड दिया गया.
6 जुलाई 2026: राजबीर सिंह हत्याकांड
पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और सहदेव उर्फ पप्पू को किसान राजबीर सिंह की हत्या का दोषी ठहराते हुए अदालत ने फांसी की सजा सुनाई.
16 साल पुराने किसान हत्याकांड में आया फैसला
तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव में प्रधानी चुनाव की रंजिश के चलते 24 अगस्त 2010 को किसान राजबीर सिंह की खेत पर काम करने के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. घटना के बाद उनके बेटे प्रदीप ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.
जांच के दौरान गांव के सहदेव, प्रमोद, अमित और विपिन शर्मा के नाम सामने आए. मुकदमे की सुनवाई के दौरान अमित और विपिन शर्मा की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो चुकी थी. वहीं, फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 16 साल बाद इस मामले में फैसला सुनाते हुए सहदेव और पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार को मृत्युदंड दिया. अदालत ने दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. फैसले के बाद दोनों को पुलिस अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया.
अभियोजन पक्ष ने क्या कहा?
मुजफ्फरनगर के जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) राजीव शर्मा के अनुसार, अदालत के इन फैसलों से पीड़ित परिवारों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हुआ है. उनका कहना है कि गंभीर अपराधों में कठोर सजा से समाज में कानून का संदेश जाता है और अपराधियों में कानून का भय बना रहता है.
क्यों चर्चा में हैं ये फैसले?
कम समय में एक ही न्यायाधीश द्वारा कई चर्चित हत्या मामलों में मृत्युदंड सुनाए जाने से ये फैसले व्यापक चर्चा का विषय बने हुए हैं. कानूनी जानकारों का कहना है कि प्रत्येक मामले में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला सुनाती है. साथ ही मृत्युदंड के मामलों में उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है और दोषियों को अपील समेत सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त रहते हैं. ऐसे में इन मामलों की आगे की कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी.











