मुजफ्फरपुर के 15 हजार पशुपालकों के लिए खुशखबरी, 161 गांवों में बनेंगी नई दुग्ध समितियां, सीधे खाते में भुगतान

बिहार में मुजफ्फरपुर जिले में दुग्ध सहकारिता को गांव-गांव तक मजबूत करने के लिए 161 नए गांवों में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां गठित की जाएंगी। इससे करीब 15 हजार नए पशुपालक सहकारिता व्यवस्था से जुड़ेंगे और जिले में प्रतिदिन करीब 10 हजार लीटर अतिरिक्त दूध संग्रहण होगा।

तिरहुत दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड (तिमूल) के निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी कुमार गौरव को तिमूल के प्रबंधक निदेशक फूल कुमार झा ने नई समिति गठन की जानकारी दी।

डीएम ने बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी सात निश्चय पार्ट-3 योजना के तहत चल रहे दुग्ध सहकारिता विस्तार कार्यक्रम की समीक्षा की। निर्देश दिया कि प्रत्येक पात्र पशुपालक को दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति से जोड़ा जाए।

निष्क्रिय व अकार्यरत समितियों को प्राथमिकता के आधार पर पुनः सक्रिय किया जाए और उनकी कार्यक्षमता सुदृढ़ की जाए। कहा कि सहकारिता आंदोलन को गांव-गांव तक मजबूत बनाना ही योजना की सफलता का आधार है।

उन्होंने कहा कि सभी दुग्ध उत्पादक पशुपालकों का भुगतान शत-प्रतिशत आनलाइन से सीधे उनके बैंक खातों में समयबद्ध तरीके से किया जाए। इससे भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी, बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी और पशुपालकों को उनके दूध का उचित मूल्य समय पर मिल सकेगा।

दुग्ध संग्रहण क्षमता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण दुग्ध उत्पादन, आधुनिक तकनीकों के उपयोग, समितियों के सुदृढ़ीकरण व पशुपालकों के प्रशिक्षण और क्षमता विकास के लिए विशेष कार्ययोजना बनाने को कहा।

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इन गांवों तक पहुंचेगी नई सेवा

तिमूल के प्रबंधन ने जानकारी दी कि जिले में कुल 1827 राजस्व गांव हैं। इनमें 1573 गांवों में समितियां गठित हो चुकी हैं, जबकि 93 गांव बेचिरागी हैं। शेष 161 गांवों में नई दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां बनाई जाएंगी।

वर्तमान में जिले में प्रतिदिन करीब 1.05 लाख लीटर दूध का संग्रहण हो रहा है। निरीक्षण के दौरान प्रबंध निदेशक फूल कुमार झा, संग्रह प्रभारी डा. एसबी हजारिका, अभियंत्रण प्रबंधक अमरनाथ, प्लांट प्रबंधक दीपक कुमार व विपणन प्रबंधक दीपक कुमार मौजूद रहे।

इसे कहते बेचिरागी गांव

राजस्व और प्रशासनिक भाषा में बेचिरागी गांव ऐसे क्षेत्रों को कहते हैं जिनकी ज़मीन व राजस्व रिकार्ड तो होता है, लेकिन वहां कोई भी स्थायी आबादी निवास नहीं करती है। इन खाली पड़ी जगहों पर दिया या चिराग जलाने वाला कोई इंसान नहीं होता।

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