अब गांव-गांव में होगा कोकून प्रोडक्शन, विदेशों में फिर मचेगी भारतीय सिल्क की धूम

अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण भारतीय रेशम की देश-विदेश में विशेष पहचान व खासी मांग है, लेकिन तसर, मलवरी आदि रेशमी वस्त्रों के लिए पर्याप्त कोकून उपलब्ध नहीं होने से इसके धागे तैयार कर मांग के अनुरूप वस्त्र तैयार नहीं की जा पा रही है।

कोकून का उत्पादन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाने के रेशम वस्त्र उत्पादकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर कोकून उत्पादन नहीं किए जाने के कारण ऐसी समस्या उत्पन्न हो रही है।

इससे यहां के रेशम वस्त्र उद्योग को चीन और कोरिया जैसे देशों के सिल्क धागे पर निर्भर होना पड़ रहा है। अब इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार ने रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों को इससे जोड़ने की दिशा में नए सिरे से ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0’ अभियान शुरू किया है।

इसके माध्यम से बिहार के रेशम क्षेत्र को नई गति देने, कोकून उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आय में वृद्धि करने और राज्य को सतत एवं उन्नत रेशम उत्पादन वाले अग्रणी राज्यों में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य गांव-गांव के किसानों को कोकून उत्पादन के लिए जागरूक करना है।

केंद्रीय सिल्क बोर्ड की टीम ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचेगी और किसानों को कोकून तैयार करने की प्रक्रिया, इससे होने वाले आर्थिक लाभ, आधुनिक तकनीकों और उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी देगी।

किसानों को समझाया जाएगा कि कैसे वे कोकून उत्पादन कर व रेशम उद्योग से जुड़कर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।

देश-विदेश में है रेशम वस्त्र की मांग

इस मसले पर विचार करने के लिए सोमवार को जीरो माइल स्थित रेशम भवन में रेशम निदेशालय, बिहार एवं केंद्रीय रेशम बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में हितधारक परामर्श बैठक आयोजित की गई।

उसमें राज्य में रेशम क्षेत्र के समग्र विकास, मूल्य संवर्धन, उद्यमिता को बढ़ावा देने, कौशल विकास, क्षमता निर्माण तथा रेशम उत्पादकों और किसानों की आय में वृद्धि के लिए विभिन्न पक्षों पर विचार-विमर्श किया गया।

वैज्ञानिक तकनीक से बढ़ेगा उत्पादन और किसानों की आय

बैठक में केंद्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान रांची के वैज्ञानिक-डी डा. कर्मबीर जेना ने रेशम उत्पादन की आधुनिक तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, अनुसंधान आधारित नवाचार और किसानों की आय बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत जानकारी दी।

वैज्ञानिक तकनीकों के व्यापक उपयोग और संस्थागत सहयोग से बिहार में रेशम उत्पादन की अपार संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रशिक्षण के माध्यम से किसान गुणवत्तापूर्ण कोकून उत्पादन कर रेशम उद्योग को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

किसानों से योजनाओं का लाभ उठाने की अपील

एमआरएमए, रेशम निदेशालय के जिला नोडल पदाधिकारी राकेश कुमार ने ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0’ कार्यक्रम के उद्देश्यों, विभिन्न गतिविधियों और रेशम उत्पादकों के लिए उपलब्ध योजनाओं की जानकारी दी।

उन्होंने हितधारकों से सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ उठाने तथा रेशम उद्योग को सशक्त बनाने में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया। अभियान का उद्देश्य केवल रेशम उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पादन से लेकर विपणन, मूल्य संवर्धन और उद्यमिता तक रेशम क्षेत्र से जुड़े सभी पक्षों को मजबूत करना है।

उत्पादन, विपणन और मूल्य संवर्धन की चुनौतियों पर भी चर्चा

बैठक में बिप्लव प्रमाणिक, क्षेत्र सहायक, केरेबो रेशम तकनीकी सेवा केंद्र भागलपुर सहित विभागीय अधिकारियों, रेशम उत्पादकों, उद्यमियों और अन्य हितधारकों ने भाग लिया। इस दौरान एरी और तसर रेशम उत्पादन से जुड़े प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।

रेशम उत्पादन, कोकून तैयार करने, विपणन, मूल्य संवर्धन और उद्यमिता से संबंधित चुनौतियों और उनके समाधान पर विस्तार से चर्चा की गई।

हितधारकों ने बताया कि किसानों को रेशम उत्पादन से जोड़ने के लिए उन्हें तकनीकी जानकारी, प्रशिक्षण, बाजार की सुविधा और सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिलना जरूरी है। केंद्रीय सिल्क बोर्ड के स्तर से जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को गांवों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।

महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की वकालत

बैठक में रेशम उद्योग में महिलाओं और युवाओं की अधिकाधिक भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी विशेष बल दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा, रेशम उत्पादन, कोकून तैयार करने, धागा निर्माण, बुनाई, डिजाइनिंग और मूल्य संवर्धन से जुड़े कार्यों में महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता की व्यापक संभावनाएं हैं।

यदि उन्हें प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए तो रेशम क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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