‘कानून से कोई बच नहीं सकता’, 85 साल के बुजुर्ग को सजा सुनाने वाले वैशाली जिला कोर्ट के जज की टिप्पणी

अपराध चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, कानून की नजर से बचना आसान नहीं होता।

वैशाली की जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम की अदालत ने 33 वर्ष पुराने जानलेवा हमले के मामले में फैसला सुनाते हुए इसी संदेश को दोहराया।

अदालत ने 85 वर्षीय बुजुर्ग समेत एक ही परिवार के पांच लोगों को दोषी ठहराकर सजा सुनाई और स्पष्ट किया कि ‘कानून से कोई बच नहीं सकता।’

जज की टिप्पणी बनी फैसले की सबसे बड़ी बात

सजा सुनाते समय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी ने 85 वर्षीय दोषी दीप राय की उम्र और शारीरिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह पूरी तरह शारीरिक रूप से अशक्त हैं।

ऐसे में कठोर सजा उनके लिए जीवन पर भारी पड़ सकती है।

हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि उम्र अपराध से मुक्ति का आधार नहीं बन सकती। इसलिए मानवीय आधार पर कम सजा दी गई, लेकिन दंडित करना जरूरी था ताकि न्याय कायम रह सके।

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33 साल पहले हुए विवाद ने लिया था हिंसक रूप

मामला 10 नवंबर 1992 का है। जुड़ावनपुर थाना क्षेत्र के राघोपुर गांव में अदालत राय अपनी पत्नी रामसखी देवी के साथ घर के बाहर बैठे थे। इसी दौरान रास्ते पर शीशे के टुकड़े बिछाने को लेकर विवाद शुरू हुआ।

विरोध करने पर आरोपितों ने पहले मारपीट की और बाद में दंपति पर गोली चला दी। गोली लगने से दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए थे। घटना के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी।

नौ लोगों पर केस, चार की सुनवाई के दौरान मौत

घटना के बाद नौ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिस ने 1993 में आरोप पत्र दाखिल किया और मामला अदालत पहुंचा।

लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान चार आरोपितों की मौत हो गई।

इसके बावजूद शेष आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई जारी रही। अभियोजन पक्ष ने अदालत में 10 गवाह पेश किए, जिनकी गवाही के आधार पर मामला आगे बढ़ा।

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26 मई को दोषी करार, अब सुनाई गई सजा

अदालत ने 26 मई को दीप राय, जगदीश राय उर्फ जीशा राय, नरेश राय, नागदेव राय और नकेश्वर राय को दोषी करार दिया था। सजा के बिंदु पर सुनवाई पूरी होने के बाद अंतिम फैसला सुनाया गया।

कोर्ट ने 85 वर्षीय दीप राय को तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी, जबकि अन्य चार दोषियों को 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास और 25-25 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया।

फैसले ने दिया बड़ा संदेश

करीब तीन दशक बाद आए इस फैसले ने यह साबित कर दिया कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया रुकती नहीं है।

अदालत की टिप्पणी और फैसला दोनों इस बात का संदेश देते हैं कि अपराध करने वाला व्यक्ति समय, उम्र या परिस्थितियों के सहारे कानून से बच नहीं सकता।

कानून से कोई बच नहीं सकता’ बना फैसले का सार

वैशाली कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में विश्वास का भी प्रतीक माना जा रहा है।

33 साल बाद आए इस निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कानून के हाथ लंबे हैं और अपराधी कितना भी समय बीत जाने के बाद आखिरकार न्याय के कटघरे तक पहुंच ही जाता है।

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