बिहार की पहचान मानी जाने वाली लीची की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले स्टिंक बग (Tessaratoma javanica) से निपटने के लिए अब वैज्ञानिकों ने कमर कस ली है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा में आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि यदि किसान फरवरी-मार्च से ही कीट की निगरानी शुरू करें और समेकित प्रबंधन अपनाएं तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। इस दौरान किसानों तक वैज्ञानिक तकनीक पहुंचाने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की भी घोषणा की गई।
खेत तक पहुंचे वैज्ञानिक तकनीक
विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं कीट विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने किया।
उन्होंने कहा कि लीची बिहार की पहचान और किसानों की आय का प्रमुख आधार है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्टिंक बग के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीक तभी सफल होगी, जब उसका लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे।
केवल दवा नहीं, बेहतर प्रबंधन जरूरी
कुलपति ने कहा कि इस कीट पर केवल रासायनिक दवाओं से नियंत्रण संभव नहीं है। इसके लिए जैविक उपायों और समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) को भी अपनाना होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विश्वविद्यालय लीची किसानों को हरसंभव तकनीकी सहायता उपलब्ध कराएगा।
फरवरी-मार्च से शुरू करें निगरानी
मुख्य अतिथि एवं राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. विकास दास ने कहा कि लीची स्टिंक बग अब राष्ट्रीय स्तर की चुनौती बन चुका है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि फरवरी-मार्च से ही बागों की नियमित निगरानी करें। अंड समूहों को नष्ट करना, समय पर अनुशंसित छिड़काव करना और परजीवी कीटों का संरक्षण इस कीट के प्रभावी नियंत्रण के प्रमुख उपाय हैं।
जागरूकता अभियान चलाने की घोषणा
डॉ. दास ने बताया कि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र और आरपीसीएयू मिलकर जिला स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएंगे, ताकि प्रत्येक लीची उत्पादक किसान तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंच सके। कार्यक्रम के दौरान लीची स्टिंक बग पर आधारित एक प्रसार पुस्तिका का भी विमोचन किया गया।
सरकार के सहयोग पर भी जोर
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. बी. बी. पटेल ने कहा कि विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने इस कीट के नियंत्रण की प्रभावी तकनीक विकसित की है।
अब इसे बड़े स्तर पर लागू करने के लिए राज्य सरकार के सहयोग और किसानों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है। कार्यक्रम में स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मयंक राय ने स्वागत भाषण दिया।











